12 जनवरी 2019 - 17:39
अमरीका ने कहा वह ईरान के घेरने के बजाए अब कार्रवाई करने के चरण में जा रहा है, तो क्या यह जंग का एलान है?

अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने मिस्र की राजधानी क़ाहेरा स्थित अमरीकी विश्वविद्यालय में जो भाषण द या वह ईरान तथा क्षेत्र में ईरान की घटक शक्तियों विशेष रूप से हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ जंग के एलान के समान था।

यह अमरीकी विदेश मंत्री की ओर से मध्यपूर्व में अमरीका की छवि सुधारने की निराशापूर्ण कोशिश थी साथ ही इस्राईल को यह आश्वासन दिलने का प्रयास भी था कि अमरीका उसकी रक्षा करेगा और उसे इतनी ताक़त देगा कि वह ईरान के रूप में मौजूद ख़तरे का सामना कर सके।

पोम्पेयो ने अमरीका की नई मध्यपूर्व रणनीति को बयान करने के लिए रियाज़ के बजाए क़ाहेरा स्थित अमरीकी विश्वविद्यालय का चयन किया तो इसका ख़ास उद्देश्य था। उद्देश्य यह था कि इस नए मिशन में मिस्र को अगुवाई सौंपी जाएगी।

पोम्पेयो बयान में सबसे ख़ास बात यह थी कि अमरीका अब ईरान को घेरने के बजाए उसका मुक़ाबला करने की नीति पर अमल करेगा, अब हम इलाक़े में ईरान के विस्तार को रोकेंगे। यह तो युद्ध की भाषा है जिसकी संभावित रूप से पहले ही तैयारी की गई है।

ईरान के घेरने के बजाए उसका सामना करने का एलान, सुन्नी अरब देशों का नैटो गठबंधन बनाने की बात और इन देशों को आपसी मतभेद भूल जाने का निर्देश यह सब कुछ इस बात का संकेत है कि अमरीका सैनिक विकल्प अपनाने की धमकी दे रहा है।

हमें यह नहीं पता कि यह धमकियां क्या ईरान पर दबाव डालने के लिए हैं कि वह वार्ता की मेज़ पर लौट आए और अमरीका तथा इस्राईल की शर्तों के अनुरूप नया समझौता करे या वास्तव में अमरीका ने सैनिक विकल्प अपनाने का फ़ैसला कर लिया है और पोम्पेयो का यह दौरा क्षेत्र को देशों को उनकी अपनी अपनी भूमिका से अवगत कराने के लिए है?

अमरीकी विदेश मंत्री के बयान से जो संदेश मिलता है उसके अनुसार अमरीका के निशाने पर ईरान के बाद हिज़्बुल्ला है। हमें इस बात की संभावना नज़र आती है कि आने वाले दिनों में हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ इस्राईल की ओर से कुछ उत्तेजक कार्यवाहियां की जाएंगी। यह बात पोम्पेयो के बयान से भी ज़ाहिर है। उन्होंने कहा कि लेबनान में हिज़्बुल्लाह का विस्तृत अस्तित्व है और हमें उसे ज़मीनी सच्चाई के रूप में नहीं मानेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि हम इस्राईल के लिए हिज्बुल्लाह के मिसाइल भंडारों से उत्पन्न होने वाले ख़तरों को कम करने के लिए इस्राईल को आवश्यक हथियारों की सप्लाई के बारे में सोच रहे हैं।

पोम्पेयो ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ट्रम्प सीरिया से अमरीकी सैनिकों को बाहर निकालेंगे लेकिन इस निष्कासन का यह मतलब नहीं है कि सीरिया के भीतर दाइश के ख़िलाफ़ अमरीका के हमले रुक जाएंगे। उन्होंने यह संकेत भी किया कि भविष्य में सीरिया में इस्राईल के सैनिक हस्तक्षेप का अमरीका की ओर से समर्थन किया जाएगा। पोम्पेयो ने कहा कि हम सीरिया को दूसरा लेबनान नहीं बनने देंगे। उनका इशारा सीरिया में ईरान की मज़बूत उपस्थिति की ओर था।

यह बात बड़ी हास्यास्पद थी कि अमरीकी विदेश मंत्री ने कहा कि उनका देश मध्यपूर्व में अतिग्रहणकारी देश नहीं बल्कि भलाई और आज़ादी का संदेश वाहक है। मानो पोम्पेयो एसे राष्ट्रों को संबोधित कर रहे थे जिनके पास ज्ञान नहीं है और जिनकी स्मरण शक्ति बहुत कमज़ोर है। क्या अमरीका ने इराक़ पर क़ब्ज़ा नही किया? क्या उसने लीबिया को तबाह नहीं किया? क्या उसने यमन और अफ़ग़ानिस्तान को ध्वस्त नहीं किया? अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने तो खुद कहा कि उनके देश ने इस इलाक़े में 7 ट्रिलियन डालर खर्च किए। क्या उन्होंने जिस भलाई की बात की उससे तात्पर्य 30 लाख इराक़ियों का क़त्ल है? क्या इससे तात्पर्य 10 लाख अफ़ग़ानों और 30 हज़ार लीबियाई नागरिकों की हत्या है? क्या आज़ादी से तात्पर्य यही है जो हम इन चार देशों में देख चुके हैं?

विदेश मंत्री पोम्पेयो ने अपने भाषण में यह सफ़ेद झूठ बोला कि अमरीका जहां से भी अपने सैनिक निकालता है वहां उथल पुथल मच जाती है। वह कैसे इस इलाक़े में अमरीकी हस्तक्षेप को भूल जाते हैं जिसने हर जगह हत्या और अशांति को जन्म दिया है। अमरीकी उपस्थिति ने आतंकवाद, अलगाववाद और विभाजन को हवा दी। क्या पोम्पेयो यह सब भूल चुके हैं?

पोम्पेयो को याद रखना चाहिए कि अमरीका इस समय सीरिया, इराक, यमन और अफ़ग़ानिस्तान में परास्त हो चुका है, लीबिया मे उसका एजेंडा विफल हो चुका है। वह ईरान के ख़िलाफ़ बड़ी बड़ी बातें करके अपने दिल को ठंडक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।

 

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार